Thursday, July 14, 2011

उधम सिंह के पौत्र श्री जीत सिंह को एक लाख रूपये की फिर सहायता

इनसे मिलिए. ये हैं प्रोफ़ेसर राम प्रकाश जी. भारतीय संसद के उपरी सदन (राज्य सभा) के माननीय सदस्य. आज इन्होने मुझे अपने घर बुलाया और "आन्दोलन:एक पुस्तक से" की गहराई तक की जानकारी ली. दो घंटे के बातचीत के दौरान कई बार इन्होने अश्रुपूरित आँखों से शहीदों को नमन किया. यह शहीद-इ-आज़म उधम सिंह के नाम पर राजस्थान में एक धर्मशाला बना रहे हैं और साथ ही अपने निजी कोष से उधम सिंह के पोते जीत सिंह जी को एक लाख रुपये सहायता राशि प्रदान करेंगे. जीत सिंह जी को हमने जल्लिंवाला बाग कांड के ९२ साल और उधम सिंह के शहीद होने के ७२ साल बाद १३ अप्रैल २१०० को अपने प्रयास (Forgotten Indian Heroes and Martyrs:Their Neglected Descendants-1857-1947) से एक नई जिन्दगी देने की कोशिश की और ११.५० लाख एकत्रित रुपये लोकमत समाचारपत्र के मालिक श्री विजय जनार्दन दरदा जी के हाथों समर्पित किया. श्री राम प्रकाश जी ३० जुलाई (इसी तारीख को उधम सिंह को फांसी लगी थी) को यह नेक कार्य संपन्न करेंगे.

Monday, July 11, 2011

स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के भूले-बिसरे वंशजों पर फीचर फिल्म

http://www.mediadarbar.com/shivenath/

1857 में हुए भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्यां टोपे और जलियांवाला बाग कांड का बदला लेने वाले शहीद-ए-आज़म उधम सिंह का नाम तो आज भी देश भर में बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, लेकिन आजादी के लिए अपने तन-मन-धन का बलिदान कर देने वाले इन शहीदों के वंशज़ आज किस बदहाली में अपना जीवन गुजार रहे हैं, यह किसी ने सोचा तक नहीं है। करीब एक सदी तक चले स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे अनेकों क्रान्तिकारी थे जिनके परिवारवालों और वंशजों को किसी ने याद नहीं रखा। इन भूले-बिसरे परिजनों और वंशजों की बदहाली को मशहूर पत्रकार शिवनाथ झा एक फीचर फिल्म के माध्यम से बयां करने की तैयारी में हैं।
झा के मुताबिक “डिस्ग्रेसफुल” (अपमानजनक) नाम की इस फिल्म के माध्यम से भारत को आजादी दिलाने वाले ऐसे शहीदों, महापुरुषों और क्रान्तिकारियों के 22 वंशजों से बातचीत के आधार पर उन परिवारों की मौजूदा दुर्दशा को झलकाने का प्रयास किया जाएगा जिनके पुरखो ने 1857 से 1947 तक चले स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। शिवनाथ झा ने मीडिया दरबार को बताया कि उन्होंने इस फिल्म की योजना 2009 में ही बना ली थी, लेकिन इसे अंजाम तक लाने में दो साल लग गए।  इस से पहले वे अपनी पत्नी नीना झा के साथ मिलकर “आन्दोलन: एक पुस्तक से” नामक अभियान भी शुरू कर चुके हैं। झा के मुताबिक यह फिल्म भी उसी अभियान का एक हिस्सा है।
झा ने बताया की यह फिल्म उन 22 परिवारों के सदस्यों से बातचीत पर आधारित होगी जो स्वतंत्रता सेनानियों की मौजूदा पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और गुमनामी में बदहाल जीवन बिता रहे हैं। उन्होंने कहा कि दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने एक बार कहा था कि भुला दिए गए राष्ट्रनायकों के परिवारों को “राष्ट्रीय परिवार” का दर्जा दिया जाना चाहिए। फिल्म में उनकी इस भावना को भी आगे रखने का प्रयास किया जाएगा।.
झा दम्पति ने देश में संगीतकारों और कलाकारों के लिए तथा बुरे हाल में रह रहे शहीदों के वंशजों के पुनर्वास के मकसद से अपना आन्दोलन शुरू किया था जिसमे प्रयेक वर्ष एक किताब के माध्यम से ऐसे लोगों को पुनर्वासित करने का संकल्प रखा गया है। दोनों ने हाल ही में एक पुस्तक फॉर्गौटेन इंडियन हीरोज़ एंड मार्टियर्स: देयर नेग्लेक्टेड डिसेंडेंट्स – 1857-1947 का विमोचन किया और इस मौके पर शहीद-ए-आज़म उधम सिंह के पौत्र जीत सिंह को 11लाख 50 हजार रुपये की सहायता भी लोकमत समाचार पत्र समूह के मालिक विजय जे डरडा के हाथों प्रदान करवाया।
57 साल के जीत सिंह का ज़िक्र करते हुए झा ने बताया कि जलियांवाला बाग कांड के दोषी अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर से बदला लेने वाले शहीद उधम सिंह के इस वंशज को भुला दिया गया है और कितनी बड़ी विडम्बना है कि उनके पौत्र का परिवार मज़दूरी के दम पर चलता था।
झा ने स्वतंत्रता सेनानी तात्यां टोपे की चौथी पीढ़ी के वंशज विनायक राव टोपे का पता 2007 में लगाया था जो कि कानपुर के पास बिठूर में बदहाली में रह रहे थे। झा ने विनायक राव के पुनर्वास की दिशा में काम किया और उन्हें 5 लाख रूपए की आर्थिक मदद दिलाने के अलावे उनकी दो बेटियों को भारतीय रेल में नौकरी दिलवाने में भी सफल रहे। इसके अलावा झा दम्पत्ति ने भारत के अंतिम मुग़ल बादशाह और 1857 के विद्रोहियों के कमांडर-इन-चीफ बहादुर शाह ज़फ़र की पौत्रवधू सुल्ताना बेगम के पुनर्वास के लिए भी काम किया था।